धारा 294 : क्या है अश्लीलता और इसका इतिहास


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  • पिछले हफ्ते 55 वर्षीय मॉडल और अभिनेता मिलिंद सोमन को अश्लीलता के आरोप में गिरफ्तार किया गया।
  • अभिनेता मिलिंद सोमन पर गोवा के बीच पर नग्न दौड़ने का आरोप लगा था। उनकी इस नग्न तस्वीर को अभिनेता ने अपने जन्मदिन के मौके पर ट्वीट किया था।
  • उन पर भारतीय दंड संहिता की धारा 294 के तहत के तहत एफ आई आर दर्ज़ की गयी थी।
  • इसके अलावा उन पर सूचना प्राद्यौगिकी अधिनियम 2000 के तहत भी मामला दर्ज़ किया गया था।
  • यह कानून अंग्रेज़ों के ज़माने से भारत में मौजूद है। इसकी जड़ें विक्टोरियन युग से हैं। आई पी सी की धारा 294 292 और 293 के साथ अश्लीलता से तालुक रखती हैं।
  • हालांकि अश्लीलता या अश्लील की परिभाषा भारतीय दंड संहिता या आई पी सी के तहत नहीं दी गयी है। वास्तव में जब ये संहिता बनायी गयी थी तो उस वक़्त धारा 292 वज़ूद में नहीं थी।
  • इसे साल 1925 में इस संहिता में शामिल किया गया था। इसे शामिल करने के मायने केवल समाज में नैतिकता और स्वीकार्यता को बढ़ावा देना था।
  • नामचीन उर्दू लेखक सआदत हसन मंटो पर कम से कम 6 बार इस धारा के तहत मुकद्दमा चलाया गया था। इनमे से ये मामले तीन बार साल 1947 के पहले दर्ज़ किये गए थे।
  • ये मामले उनकी रचनाओं धुंआ ,बू और काली सलवार के लिए दर्ज़ किये गए थे। इन सभी मामलों को तत्कालीन ब्रिटिश भारत में आई पी सी की धारा 292 के तहत दर्ज़ किया गया था।
  • आज़ादी के बाद हिन्दुस्तान और पकिस्तान का बँटवारा हो गया। मंटो पाकिस्तान चले गए जहां पाकिस्तानी हुकूमत ने भी 3 बार उन पर अश्लील साहित्य के इलज़ाम में मामला दर्ज़ किया।
  • इस बार ये मामले उनकी कहानियों खोल दो ,ठंडा गोश्त और ऊपर नीचे दरमियान के लिए दर्ज़ हुए थे। हालांकि इन मामलों में सिर्फ एक बार मंटो पर जुर्माना लगा था।
  • लेकिन इस दौरान मामले की सुनवाई में उन पर बेहद संगगीन इलज़ाम लगे और कार्रवाई ने उन्हें पूरी तरह झकझोर दिया।
  • हालांकि धारा 294 के तहत अश्लीलता की कोई परिभाषा नहीं है लेकिन धारा 292 के तहत ऐसी किताबों पर बंदिशें हैं जिनमे अश्लीलता का पुट हो।
  • इस धारा को आई पी सी में साल 1925 में किये गए संशोधन के त्तहत्त डाला गया था। यह एक ऐसा वक्त्त था जब एक अच्छी तादाद में यूरोप में किताबों की बिक्री हो रही थी और इस दौरान भारत में भी किताबें अपना बाजार बनाने लगी थी।
  • कुछ आंकड़ों पर गौर करें तो पत्ता चलता है की साल 1880 तक भारत अंग्रेज़ी किताबों का एक बड़ा बाजार बन चुका था।
  • कुछ फ्रांसीसी उपन्यास भी भारत में काफी मशहूर थे जिनमे एम ज़ोला के उपन्यास काफी पढ़े जाते थे। इन्हे आम तौर पर अंग्रेज़ी और स्थानीय भाषाओँ में अनुवादित किया जाता था।
  • हालांकि अँगरेज़ इन फ्रांसीसी उपन्यासों को लेकर काफी सजग रहते थे जिसकी वजह इसमें छापा गयी चीज़ों का अनियतिक और भद्दा होना था और अंग्रेज़ों के मुताबिक़ ऐसे उपन्यास यहां के युवाओं को बर्बाद कर रहे थे।
  • इसे देखते हुए अँगरेज़ सरकार ने साल 1924 में एक नए अश्लील प्रकाशन विधेयक को पेश किया। इसी विधेयक की बदौलत आई पी सी में धारा 292 को लाया गया।
  • इस विधेयक में मौजूद प्रावधानों में साफ़ साफ़ लिखा था की कोई किताब , पेपर , लिखित सामग्री ,कलाकृति ,पेंटिंग कोई तस्वीर या ऐसी चीज़ जिससे कामुकता या ऐसी भावनाएं बढ़काती हो तो इसे अश्लील करार दिया जाएगा।
  • इसके साथ साथ ऐसे सभी चीज़ें जिसकी वजह से समाज में भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिले उन्हें भी इसकी ज़द में शामिल किया जाएगा।
  • इस धारा के तहत ऐसे सभी साहित्य या प्रकाशन को बेचना बांटना किराए पर देना या इसका आयात निर्यात कर इससे मुनाफ़ा कमाना गैर कानूनी होगा।
  • इसके अलावा इसका प्रचार करना या इसे लोगों के संज्ञान में लाना भी कानून की नज़रों में अपराध माना जायेगा।
  • धारा 294 जिसके तहत सार्वजनिक जगहों पर अश्लील कृत्य और गानों पर रोक लगाई गयी है का वज़ूद काफी पुराना है और यह कानून की किताबों में 1895 से ही चला आ रहा है।
  • प्रकाशन के अलावा इस धारा के तहत ऐसे सभी कामों को भी गैरकानूनी माना गया है जिससे अश्लीलता झलकती हो। ऐसे सभी कृत्यों को कानूनन सज़ा का हक़दार माना गया है।
  • समाज की नज़र में ऐसी हरकतें सहन नहीं की जाएंगी।
  • अभिनेता और मॉडल मिलिंद सोमन को आई टी एक्ट की धारा 67 के तहत गिरफ्तार किया गया है।
  • उन्हें अपनी अश्लील तस्वीर सोशल मीडिया पर डालने का आरोपी करार दिया गया है।
  • इस धारा के तहत ऐसी चीज़ें जो अश्लील हों या जिनके ज़रिये अश्लीलता फैलती हो उन्हें इंटरनेट पर प्रकाशित करना गैर कानूनी है।
  • इसमें इस्तेमाल होने वाली ज़्यादातर भाषा और इसकी संवेदनशीलता को धारा 292 से लिया गया है। हालाँकि अगर गुणात्मक रूप से नज़र डालें तो ये दोनों ही प्रावधान काफी हद तक एक ही जैसे हैं ।
  • हालांकि अश्लीलता की परिभाषा इस कानून के हिसाब बहुत सशक्त नहीं है और इसकी व्याख्या करने की ज़रुरत महसूस होती है।
  • कई अदालतों ने किसी भी चीज़ को अश्लीलता के दायरे में रखने के लिए कुछ ख़ास परीक्षणों को इज़ाद किया है। इसकी शुरुआत हिकलिन परीक्षण से हुई थी।
  • हिकलिन परीक्षण को 1868 के अँगरेज़ मामले रेजिना बनाम हिकलिन से लिया गया था जिसके तहत ऐसे दृश्यों को जिनसे अश्लीलता की झलक मिले उन्हें नहीं दिखाया जाना चाहिए।
  • इसे ऐसे समझा जा सकता है की किसी बलात्कार के दृश्य से अगर लोगों की भावनाएं भड़कती है या समाज में इनके ज़रिये गलत सन्देश जाता है तो ऐसे दृश्यों को अश्लील करार दिया जाएगा भले ही इन्हे कलात्मक या साहित्यिक रूप से समृद्ध बनाया गया हो।
  • भारत में पहली बार इस परीक्षण को साल 1964 के रंजीत डी उदेशी बनाम महराष्ट्र राज्य मामले में अपनाया गया था। इस मामले में धारा 292 की संवैधानिकता को चुनौती दी गयी थी।
  • इसके अलावा डी एच लॉरेंस के उपन्यास लेडी चटरले लवर पर सरकार द्वारा लगाई गयी रोक को भी चुनौती दी गयी थी।
  • इस कानून में ऐसे प्रकाशनों को इसके दायरे से बाहर किया गया है जिन्हे जनता की भलाई या फिर विज्ञान साहित्य कला या सीखने के लिहाज़ से सही माना जात्ता हो।
  • इसके अलावा ऐसे मामलों को भी इसके दायरे से बाहर रखा गया है जिन्हे धार्मिक नज़रिये से अहम् करार दिया जाता हो।
  • धार्मिक मामलों को इस धारा में शामिल करने की वजह दरअसल हिन्दू देवी देवताओं की नग्न तसवीरें प्रकाशित करने पर उठा विवाद था।
  • रंजीत डीउदेशी मामले के बाद हिकलिन परीक्षण को लेकर काफी विवाद पैदा हुए। ऐसा माना जा रहा था की इस परीक्षण को अश्लीलता का पैमाना नहीं माना जा सकता।
  • इसके अलावा बिना किसी वजह के किसी भी चीज़ को अश्लील करार देना भी जायज़ नहीं ठहराया जा सकता।
  • जैसे सोमन का नग्न होकर दौड़ना महज़ इसलिए किया गया था की वे इससे ये दर्शाना चाहते थे की 55 साल के होने के बावजूद भी वो कितने फिट हैं।
  • बैंडिट क्वीन फिल्म में भी एक बलात्कार के दृश्य को लेकर विवाद उठा था जिसमे इसे अश्लील करार दिया गया था।
  • इसके तहत साल 1996 में बॉबी आर्ट इंटरनेशनल बनाम ओम पाल सिंह हून मामले में बैंडिट क्वीन फिल्म के दृश्य को अष्लीलतता के आधार पर अदालत में चुनौती दी गयी थी।
  • सर्वोच्च न्यायलय ने इस पर फैसला सुनाते हुए कहा की अश्लीलता को पूरी फिल्म के लिहाज़ से देखा जाना चाहिए और इस बात को दरकिनार कर दिया की विवादित दृश्यों को हटा देना चाहिए।
  • सर्वोच्च न्यायलय ने कहा की यह दृश्य इस फिल्म का हिस्सा है और इसे अकेले तौर पर नहीं देखा जा सकता।
  • न्यायलय ने पाया की इसमें दर्शाया गया दृश्य हटाना मुमकिन नहीं है क्यूंकि इस दृश्य के ज़रिये फूलन देवी के साथ हुए अमानवीय कृत्य की कहानी बयान होती है
  • इसके अलावा इसके ज़रिये तत्कालीन समाज की दशा और परिस्थितियां भी उजागर होती हैं। इसके अलावा फिल्म से इन दृश्यों को हटाने से संवेदनशीलता भी ख़त्म हो जाएगी।
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