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- बिहार में चुनावों की घड़ी नज़दीक आ गयी है। कोरोना महामारी के चलते इस बार चुनाव प्रचार के दौरान पार्टियां काफी एहतियात बरत रही हैं। ज़्यादातर रैलियां विडिओ कॉन्फ़्रेंसिंग के ज़रिये हो रही हैं। ऐसे में लोगों को लुभाने के और चुनाव प्रचार में वो जोश नहीं नज़र आ रहा है जो हाल के सालों में दिखाई देता था।
- बिहार चुनाव में वैसे तो मुकाबला सत्त्ताधारी पार्टियों भारतीय जनता पार्टी और जनता दल यूनाइटेड और कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल के बीच है। भारतीय जनता पार्टी का चुनाव चिन्ह कमल है जबकि जनता दल यूनाइटेड का चुनाव चिन्ह तीर है वहीं राष्ट्रीय जनता दल लांटेन और कांग्रेस का चुनाव निशान पंजा है।
- इन बड़ी पार्टियों के चुनाव निशानों के साथ कई बेहद दिलचस्प चुनाव निशान वाली पार्टियां इस बार चुनावी मैदान में दिखाई देंगी। इन चुनाव निशानों में रोटी का बेलन ,डोली , चूड़ियां , शिमला मिर्च सबसे अहम् हैं।
- बिहार में चुनाव 28 अक्टूबर से शुरू हैं। राज्य में चुनाव तीन चरणों में पूरे होंगे। दूसरा चरण 3 नवंबर जबकि तीसरा और आख़िरी चरण 7 नवंबर को होगा।
- बिहार के इस चुनाव में छोटी बड़ी पार्टियों को मिलाकर कुल 60 पार्टियां मैदान में हैं। जहां चुनाव निशान कई पार्टियों की पहचान होती हैं तो वहीं ये निर्दलीय उम्मीदवारों को भी चुनाव के समय एक तरह की पहचान मुहैया कराती हैं।
- चुनाव निशान अलग अलग होने से वोटरों को भी बैलट लिस्ट पर अपने उम्मीदवार पहचानने में दिक्कतें नहीं उठानी पड़ती हैं।
- भारत जैसे देश में जहाँ कदम कदम पर हमें बदलाव देखने को मिलते हैं वहीं यहां पर हर चुनाव में भी छोटी बड़ी पार्टियां हर चुनाव में अपनी किस्तम आज़माते हैं।
- इन चुनावों में चुनाव चिन्ह वोटरों के साथ उम्मीदवारों को जोड़ने में अहम भूमिका अदा करते हैं। साल 1951 -52 के पहले चुनाव से लेकर अब तक चुनाव निशानों ने चुनावी प्रक्रिया में एक बड़ी भूमिका निभाई है।
- भारत के शुरुआती चुनावों के दौर में 85 फीसदी आबादी साक्षर नहीं थी ऐसे में चुनाव निशाँ ही वो कड़ी थे जिन्होंने आम जनता को उम्मीदवारों से जोड़ने में बड़ी भूनिका निभाई।
- चुनाव निशानों से ये वोटर अपने उम्मीदवारों को आसानी से पहचान लेते थे।
- 2017 के निर्वाचन प्रतीक आरक्षण एवं आवंटन आदेश के मुताबिक़ पार्टी के चिन्ह या तो आरक्षित होते हैं या फिर स्वतंत्र।
- भारत में इस वक़्त 8 राष्ट्रीय दाल और 64 राज्य स्तरीय पार्टियां हैं जिनके चुनाव निशान आरक्षित हैं। इसका मतलब ये है की और कोई पार्टी इन निशानों का इस्तेमाल नहीं कर सकती है।
- चुनाव आयोग के पास तकरीबन 200 प्रतीक या निशान ऐसे हैं जो किसी भी पार्टी को नहीं दिए गए हैं। इन्ही निशानों में से चुनाव आयोग कई क्षेत्रीय पार्टियों को ये चुनाव निशान चुनाव आवंटित करती है।
- चुनाव आयोग की माने तो भारत में तकरीबन 2500 से ज़्यादा दल ऐसे हैं जिनकी कोई पहचान नहीं है।
- मिसाल के तौर पर अगर किसी राज्य की कोई पार्टी किसी दुसरे राज्य में चुनाव लड़ती है तो यह अपना चुनाव निशान आरक्षित कर सकती है बशर्ते ये निशान कोई दूसरी पार्ट न इस्तेमाल कर रही हो।
- निर्वाचन प्रतीक आरक्षण एवं आवंटन आदेश को पहली बार साल 1968 में लाया गया था। इसके तहत चुनाव आयोग राजनैतिक दलों को संसदीय या विधान सभा के चुनावों में प्रतीक चिन्ह आवंटित करती है या उनके चुनाव चिन्ह ुरक्षित रखती हो।
- चुनाव चिन्ह का कार्य राजनीतिक दलों को पहचान मुहैया कराना है।
- दिशा निर्देशों के अनुसार चुनाव चिन्ह आवंटित करने के लिए पार्टी या उम्मीदवार को चुनाव आयोग की चुनाव चिन्हों की सूची में से तीन विकल्प देने होते हैं। ये विकल्प उसके चुनाव के समय पर्चा भरने के दौरान दिए जाते हैं। इनमे से एक चिन्ह उस पार्टी या उमीदवार को आवंटित कर दिया जाता है। ये चिन्ह आम तौर पर पहले आइये पहले पाइये के सिद्धांत पर आवंटित किया जाता है
- जब कोई जाना माना राजनीतिक दल टूटता है तो विघटित दल को चुनाव चिन्ह देना चुनाव आयोग का ज़िम्मा होता है। मिसाल के तौर पर समाजवादी पार्टी के विघटन के बाद चुनाव आयोग ने साइकिल चुनाव निशान अखिलेश यादव के धड़े को दिया था।
- इसी तरह जयललिता की मृत्यु के बाद आल इंडिया एना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम दो भागों में बाँट गयी और इन दोनों धड़ों ने पार्टी के चुनाव निशान 2 पत्तियों की मांग की थी। सुनवाई के बाद चुनाव आयोग ने दो पत्तियों वाला चुनाव निशान पलानिस्वामी -पन्नीरसेल्वम धड़े को देने का फैसला किया। इस फैसले का आधार ये था की की पनीरसेल्वम वाले धड़े का विधान सभा और पार्टी में ज़्यादा बहुमत था।